Thursday, 9 July 2015

एक लौ ज़िंदगी की !



एक   लौ  ज़िंदगी  की !


गर्दिशों में रेहती, 
रेहती गुज़रती
ज़िंदगी आहें कितनी

इन में से एक है, 
तेरी मेरी आखरी
कोइ एक जैसी अपनी

पर ख़ुदा ,खैर कर ऐसा अंजाम 
किसी रूह को ना दे कभी ,यहाँ

गुझा मुस्कुरता है क्युं वक़्त 
से पेहेले क्युं छोड़ चला तेरा ये जहाँ


एक लौ इस तराह ,क्युं बुझी मेरे मौला
एक लौ ज़िंदगी की   !                                         मौला

एक लौ इस तराह ,क्युं बुझी मेरे मौला
एक लौ ज़िंदगी की   !                                        मौला


धूप के ऊजाले सी, पुन्स की प्याले सी, 
खुशियां मिले हम को

ज़्यादा मांगा है कहाँ, सरहदें ना हो जहां, 
दुनिया मिले हम को

पर खुदा खैर कर, 
उस के अरमान में ,क्युं बेवझा हो कोइ क़ुरबान

गुझा मुस्कुराता है ,क्युं वक़्त 
से पहले क्युं छोड चला तेरा ये जहां   
…………………………………………………………….

एक लौ इस तराह क्युं, बुझी मेरे मौला
एक लौ ज़िंदगी की    !                                    मौला


एक लौ इस तराह क्युं, बुझी मेरे मौला
             मौला
एक लौ ज़िंदगी की !               मौला



एक लौ इस तराह क्युं ,बुझी मेरे मौला

एक लौ ज़िंदगी की  !  

मौला !



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