लिखना तो बहुत चाहता था लिख नहीं पाया
कुछ अशांत मन को जगाने से ही, जग आया
मैं हूँ जहाँ
उस थल पर कहाँ
कोई और पहुँच पाएगा यदि उसे बुलाया .... ?
किसी काण्ड पे कोई क्या लिखे कहे,
लिखावर की ज़िद पर क्या बयान चले
हम हैं तो वो जब
वो हैं तो हम अब
इस विचार धारा पे कैसे कोई जीवन चले, बने .... ?
समझ पाओगे न वो जो जीवन में शांत रहता
सोच गहरी हो, तभी तो न विशवास बनता
मै लिए एक बाण को , खींच उस कमान को छेड़ देता , तो क्या मुझपर ही ब्रह्माण्ड गिरता …?
~ Amitabh Bachchan

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