ये दिल ये पागल दिल मेरा , क्यों बुझ गया आवारगी !
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ये दिल, ये पागल दिल मेरा , क्यों बुझ गया , आवारगी
इस दश्त में , इक शहर था, वो क्या हुआ, आवारगी
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ये दिल, ये पागल दिल मेरा , क्यों बुझ गया , आवारगी
इस दश्त में , इक शहर था, वो क्या हुआ, आवारगी
कल शब , मुझे बेशक्ल की आवाज़ ने, चौंका दिया
मैंने कहा , तू कौन है , उसने कहा , आवारगी
ये दर्द की, तन्हाईयाँ, ये दश्त का वीरां सफर
हम लोग तो , उकता गए, अपनी सुना , आवारगी
हम लोग तो , उकता गए, अपनी सुना , आवारगी
लोगो भला , उस शहर में , कैसे जियेगें हम
जहाँ हो , जुर्म तनहा सोचना , लेकिन सजा , आवारगी
जहाँ हो , जुर्म तनहा सोचना , लेकिन सजा , आवारगी
इक अजनबी झोंके ने , जब पूछा मेरे गम का , सबब
सहरा की भीगी रेत पर , मैंने लिखा , आवारगी
सहरा की भीगी रेत पर , मैंने लिखा , आवारगी
कल रात तनहा , चाँद को देखा था मैंने , ख्वाब में
`मोहसिन’ मुझ ये रास आएगी , शायद सदा , आवारगी !
`मोहसिन’ मुझ ये रास आएगी , शायद सदा , आवारगी !
इतनी मुद्दत बाद मिले हो , किन सोचों में गुम रहते हो ?
कौन सी बात है तुम में ऐसी
इतने अच्छे क्यों लगते हो ?
इतने अच्छे क्यों लगते हो ?
हमसे न पूछो हिज्र के किस्से
अपनी कहो अब तुम कैसे हो ?
अपनी कहो अब तुम कैसे हो ?


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